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सैनिक

*सैनिक*   कोण बरे हा सीमेवरती            उभा राही दिनरात  पाऊस,वारा थंडी, उन्हाळा             सा-यांस देई मात अपार परिश्रम करुनी         ‌‌रक्षी तो देशाच्या सीमा  सतत राही जागरुक अन्          निभवी चोख आपुल्या कामा झुगारुनी सकल सुखांना            तो लढवित जातो खिंड  क्षणात पळवून लावित जातो           शत्रुपक्षाची झुंड बंदुक त्याची सदैव तत्पर           अंगी नेटका गणवेश  सांगे,"आम्ही तुम्हा रक्षण्या            नको भीतीचा लवलेश" त्यासही असती मुलेबाळे              अन्  पत्नी,माता,पिता जरी वाहतो अंतरंगी तो            कुटुंबियांची चिंता परि येता प्रसंग युद्धाचा           तो पेटून उठतो पार विसरून जाई कुटुंब स्वतः चे        ...